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दो मुक्तक

चलते रहना बहुत ज़रूरी है,

दिल की कहना बहुत ज़रूरी है,

देखो, सागर बनेंगे ये आंसू,

इनका बहना बहुत ज़रूरी है।

शहर आँखों में समेटे जा रहे हैं,

स्वार्थ की परतें लपेटे जा रहे हैं,

छोड़कर माँ-बाप बूढ़े, कोठरी में,

बीवियों के संग बेटे जा रहे हैं.

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ग़ज़ल- 3

अक्सर तेरे ख्याल से बाहर नहीं हुआ शायद यही सबब था मैं पत्थर नहीं हुआ। महका चमन था, पेड़ थे, कलियाँ थे, फूल थे, तुम थे नहीं तो पूरा भी मंज़र नहीं हुआ। माना मेरा वजूद नदी के समान है, लेकिन नदी बगैर समंदर नहीं हुआ। जिस दिन से उसे दिल से भुलाने की ठान ली, उस दिन से कोई काम भी बेहतर नहीं हुआ। साए मैं किसी और के इतना भी न रहो, अंकुर कोई बरगद के बराबर नहीं हुआ।

मुक्तक

यूँ भी हुए तमाशे सौ। पाया एक, तलाशे सौ। जब भी उसका नाम लिया, मुंह में घुले बताशे सौ। यूँ समझो था ख्वाब सुनहरा याद रहा। मुझे सफ़र में तेरा चेहरा याद रहा। कैसे कह दूँ तेरी याद नहीं आई, रस्ते भर खुशबु का पहरा याद रहा.