सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कहाँ गए दिन फूलों के

अँधियारा जंगल-जंगल
दूर-दूर तक अब केवल
दिखते झाड़ बबूलों के
कहाँ गए दिन फूलों के।

हर पनघट सूना-सूना
सूनी-सूनी चौपालें
मौन चतुर्दिक घूम रहा
पहन हादसों की खालें
गुमसुम नीम, मौन आंगन,
ठिठका सा देखे सावन
मुखड़े सहमे झूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के।

अंकुर की करतूतों पर
बादल भी शर्माता है
पूरब का सारथी यहाँ
पश्चिम को मुड जाता है
छल से भरे स्वयम्वर में
और झूठ के ही घर में
चर्चे हुए उसूलों के,
कहाँ गए दिन फूलों के.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

दो मुक्तक

चलते रहना बहुत ज़रूरी है, दिल की कहना बहुत ज़रूरी है, देखो, सागर बनेंगे ये आंसू, इनका बहना बहुत ज़रूरी है। शहर आँखों में समेटे जा रहे हैं, स्वार्थ की परतें लपेटे जा रहे हैं, छोड़कर माँ-बाप बूढ़े, कोठरी में, बीवियों के संग बेटे जा रहे हैं.

ग़ज़ल- 3

अक्सर तेरे ख्याल से बाहर नहीं हुआ शायद यही सबब था मैं पत्थर नहीं हुआ। महका चमन था, पेड़ थे, कलियाँ थे, फूल थे, तुम थे नहीं तो पूरा भी मंज़र नहीं हुआ। माना मेरा वजूद नदी के समान है, लेकिन नदी बगैर समंदर नहीं हुआ। जिस दिन से उसे दिल से भुलाने की ठान ली, उस दिन से कोई काम भी बेहतर नहीं हुआ। साए मैं किसी और के इतना भी न रहो, अंकुर कोई बरगद के बराबर नहीं हुआ।

प्यार के दोहे

प्यार युद्ध, हिंसा नहीं, प्यार नहीं हथियार, प्यार के आगे झुक गईं, कितनी ही सरकार। प्यार कृष्ण का रूप है, जिसे भजें रसखान, प्यार जिसे मिल जाये वो, बन जाये इंसान। प्यार हृदय की पीर है, प्यार नयन का नीर, ढाई आखर प्यार है, कह गए संत कबीर। प्यार न समझे छल-कपट, चोरी, झूठ या लूट, प्यार पवित्र रिश्ता अमर, जिसकी डोर अटूट। प्यार में ओझल चेतना, प्यार में गायब चैन, प्यार अश्रु अविरल-विकल, जिसमें भीगें नैन।