मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

ग़ज़ल-2

याद आते हैं हमें जब चंद चेहरे देरतक
हम उतर जाते हैं गहरे और गहरे देरतक .

चांदनी आँगन में तहली भी तो दो पल के लिए
धूप के साए अगर आए तो ठहरे देरतक .

बंदिशें दलदल पे मुमकिन ही नहीं जो लग सकें
रेत की ही प्यास पर लगते हैं पहरे देरतक .

हम नदी हैं पर खुशी है हम किसी के हो गए
ये समंदर कब हुआ किसका जो लहरे देरतक.

ये हकीक़त है यहाँ मेरी कहानी बैठकर
गौर से सुनते रहे कल चंद बहरे देरतक.

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