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सौ-सौ नहीं हजारों अभिनन्दन करना

जिसने बढते तूफानों को थाम लिया,
आँसू से भी अंगारों का काम लिया,
जिसका पौरुष देख पराजित पाक हुआ,
सभी विरोधी अमला हटा हलाक हुआ,
जिसने की मरने मिटने की तैयारी,
जान गँवा दी, लेकिन बाज़ी न हारी,
ऐसे अमर शहीद का तुम वंदन करना,
सौ-सौ नहीं हजारों अभिन्दन करना।

मांग भरी थी उसने कल ही दुल्हन की,
खनखन भी पूरी न सुनी थी कंगन की,
चाँद सरीखा मुखड़ा तक न देख सका,
एक रात की अंगडाई तक नहीं रुका,
रुनझुन करती पायल के स्वर मौन हुए,
सिहरन ने भी होंठ हृदयके नहीं छुए,
भरी गुलाबों की डाली को भूल गया,
फांसी के फंदे पर जाकर झूल गया,
ऐसे अमर शहीद का तुम वंदन करना,
सौ-सौ नहीं हजारों अभिनन्दन करना।

दो ही दिन तो हुए थे घर आया था वो,
केक पेस्ट्री थैला भर लाया था वो,
जन्मदिवस उसके बच्चे का पहला था,
जीवनपथ का पल ये नया रुपहला था,
लेकिन सजते-सजते कमरा छूट गया,
वक्त लुटेरा बनकर खुशियाँ लूट गया,
एक तार ने तार-तार सब तार किए,
फिर भी जिसने माँ की खातिर प्राण दिए,
ऐसे अमर शहीद का तुम वंदन करना,
सौ-सौ नहीं हजारों अभिनन्दन करना।

श्रवन सरीखा, एकलव्य सा प्यारा था,
अंधे की लाठी, आंखों का तारा था,
एक अकेला चाँद, सुदीपक सूबे का,
घर का पालनहार, लक्ष्य मनसूबे का,
सरहद पर टिकना भी बहुत ज़रूरी था,
दुश्मन से टक्कर लेना मजबूरी था,
सौ-सौ पर इकलौता था पर भारी था,
ग़लत इरादों की गर्दन पर आरी था,
ऐसे अमर शहीद का तुम वंदन करना,
सौ-सौ नहीं हजारों अभिनन्दन करना.


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प्यार के दोहे

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प्यार के आगे झुक गईं, कितनी ही सरकार।

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प्यार हृदय की पीर है, प्यार नयन का नीर,
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प्यार न समझे छल-कपट, चोरी, झूठ या लूट,
प्यार पवित्र रिश्ता अमर, जिसकी डोर अटूट।

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प्यार अश्रु अविरल-विकल, जिसमें भीगें नैन।

ग़ज़ल

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अहसास को अल्फाज़ के सांचे में ढालिये।।

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ऐसा दिलो दिमाग़ में रिश्ता न पालिये।।

दीवार रच रही है बांटने की साजिशें,
उठिये कि घर संभालिये, आंगन संभालिये।।

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तो चीखिये, आवाज़ के पत्थर उछालिये।।

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- चेतन आनंद

मुक्तक

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जब भी उसका नाम लिया,
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