मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

दोहे

युग बीता, मौसम गए, बदला सब परिवेश।
किंतु तिमिर से रोज़ ही, लड़ता रहा दिनेश।

उसकी यादों में रहा, मैं इतना मशगूल।
फूल बताकर बो गए, घर में लोग बबूल।

सूख गई भागीरथी, भागीरथ लाचार।
व्यथित, व्यग्र, अभिशप्त है, सकल, सगर परिवार।

दुःख का पारावार सह, मत हो अधिक अधीर।
चिंता का सिर काटती, चिंतन की शमशीर।

कटा, कटाया अन्न सब, रखा खेत में धान।
कला कौया ले गया, ताकता रहा किसान।

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