गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

ग़ज़ल

सुख कम हैं, दुःख हज़ार बुजुर्गों के वास्ते।
कैसी समय की मार बुजुर्गों के वास्ते।

जो फूल थे, औलादें उठाकरके ले गईं,
बाकी बचे जो खार बुजुर्गों के वास्ते।

गैरों को करें रोज़ ही ईमेल, एसमएस,
चिठ्ठी न कोई तार बुजुर्गों के वास्ते।

बेटा गया विदेश तो बेटी न पास है,
बस यादें बेशुमार बुजुर्गों के वास्ते।

बेटों ने जो ज़मीन थी आपस में बाँट ली,
जो था बचा उधार बुजुर्गों के वास्ते।

सेवा करेगा इनकी तो आशीष मिलेंगे,
चेतन तू हो तैयार बुजुर्गो के वास्ते.

2 टिप्‍पणियां:

  1. कड़वा सच ...बेहतरीन प्रस्तुति

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  2. चेतन जी आपकी गज़लें लाजवाब हैं । मैने तो अभी 2-3 महीने पहले सीखनी शुरू की है मगर मुझे नहीं लगता कि आपकी गज़लों की तरह मैं कभी लिख पाऊँगी। धीरे धीरे सभी गज़लें पढूँगी आपकी। धन्यवाद

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