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सोच लिया तो सोच लिया

जीवन खुशियों से भर दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।
चिंताओं पर फतह करूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।

जीवन से बढ़कर समाज है और समाज से ऊपर देश,
देश की खातिर जां दे दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।

कितनी भी बाधाएं आएं, भारी संकट हों सर पर,
तुमको चाहा है, चाहूँगा, सोच लिया तो सोच लिया।

उसके सच को वज़न मिले तो, आखिर मैंने सोचा है,
दर्पण को चेहरा दे दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।

खूब खताएं की हैं मैंने, पश्चाताप करूँ कैसे,
माँ के आगे सर रख दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।

बच्चों की गुल्लक के पैसे लेकर राशन ले आया,
आगे ठीकठाक कर लूँगा, सोच लिया तो सोच लिया.

हंसी नहीं ला पाऊँ शायद उनके होठों पे "चेतन "
कम से कम, ग़म कम कर दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया.

टिप्पणियाँ

  1. जीवन से बढ़कर समाज है और समाज से ऊपर देश,
    देश की खातिर जां दे दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।
    खूब खताएं की हैं मैंने, पश्चाताप करूँ कैसे,
    माँ के आगे सर रख दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।बहुत सुन्दर रचना है ये [पंम्क्तियाँ तो दिल को छू गयी । शुभकामनायें

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  2. जीवन खुशियों से भर दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।
    चिंताओं पर फतह करूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।

    जीवन से बढ़कर समाज है और समाज से ऊपर देश,
    देश की खातिर जां दे दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया।

    हंसी नहीं ला पाऊँ शायद उनके होठों पे "चेतन "
    कम से कम, ग़म कम कर दूंगा, सोच लिया तो सोच लिया
    bahut sunder rachana..........

    उत्तर देंहटाएं

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प्यार के दोहे

प्यार युद्ध, हिंसा नहीं, प्यार नहीं हथियार,
प्यार के आगे झुक गईं, कितनी ही सरकार।

प्यार कृष्ण का रूप है, जिसे भजें रसखान,
प्यार जिसे मिल जाये वो, बन जाये इंसान।

प्यार हृदय की पीर है, प्यार नयन का नीर,
ढाई आखर प्यार है, कह गए संत कबीर।

प्यार न समझे छल-कपट, चोरी, झूठ या लूट,
प्यार पवित्र रिश्ता अमर, जिसकी डोर अटूट।

प्यार में ओझल चेतना, प्यार में गायब चैन,
प्यार अश्रु अविरल-विकल, जिसमें भीगें नैन।

ग़ज़ल

ऐसा भी कोई तौर तरीका निकालिये।
अहसास को अल्फाज़ के सांचे में ढालिये।।

जलता रहे जो रोज़ ही नफ़रत की आग में,
ऐसा दिलो दिमाग़ में रिश्ता न पालिये।।

दीवार रच रही है बांटने की साजिशें,
उठिये कि घर संभालिये, आंगन संभालिये।।

सोया है गहरी नींद में बहरा ये आसमां,
तो चीखिये, आवाज़ के पत्थर उछालिये।।

फाक़ाकशी में भूख लगी तो यही किया,
हमने ये अश्क पी लिये, ये ग़म ही खा लिये।।

- चेतन आनंद

मुक्तक

यूँ भी हुए तमाशे सौ।
पाया एक, तलाशे सौ।
जब भी उसका नाम लिया,
मुंह में घुले बताशे सौ।

यूँ समझो था ख्वाब सुनहरा याद रहा।
मुझे सफ़र में तेरा चेहरा याद रहा।
कैसे कह दूँ तेरी याद नहीं आई,
रस्ते भर खुशबु का पहरा याद रहा.