बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

ग़ज़ल-4

अजब अनहोनिया हैं फिर अंधेरों की अदालत में

उजाले धुन रहें हैं सिर अंधेरों की अदालत में।

पुजारी ने बदल डाले धरम के अर्थ जिस दिन से,

सिसकता है कोई मन्दिर अंधेरों की अदालत में।

जो डटकर सामना करता रहा दीपक, वो सुनते हैं

वकीलों से गया है घिर अंधेरों की अदालत में।

सवेरा बाँटने के जुर्म में पाकर गया जो कल,

वो सूरज आज है हाज़िर अंधेरों की अदालत में।

सुना है फिर कहीं पर रौशनी की द्रोपदी चेतन,

घसीटी ही गई आखिर अंधेरों की अदालत में.

4 टिप्‍पणियां:

  1. achchhi Ghazal hai chetan ji
    aapka link apne blog par de diya hai
    kripya jude rahein
    -chirag jain

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  2. kavyanchal.blogspot.com par apne blog ka link dekh sakte hain

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  3. this is really a nice poem, infact the poet has used very impressive words in the poetries which depicts the feeling of him for the love and the soiety.Keep up writing such nice poems. Goodluck and blessing to him

    Rakesh Gupta
    Vasundhara
    9911356409

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  4. The poet has used really nice word and his poetries which depicts his feeling for the love and the society. keep up writing the same ande all the best.

    Rakesh Gupta
    9911356409

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