बुधवार, 1 अप्रैल 2009

ग़ज़ल

लिख नहीं पाए बहुत ज़्यादा मगर कुछ तो लिखा
प्यार की दीवार पे ग़म का असर कुछ तो लिखा.

मन की उलझन, तन की चिंता, काम से भारी थकन,
जिंदगी के फलसफे पर रातभर कुछ तो लिखा।

ये चलो माना कि हम आगाज़ पे चुप रह गए,
जिंदगी लेकिन तेरे अंजाम पर कुछ तो लिखा।

पढ़ नहीं पाया हमारे दिल को वो तो क्या हुआ,
चूमकर उसने हमारे गाल पर कुछ तो लिखा।

छोड़िये किस्मत में उसने क्या लिखा, क्या न लिखा,
चिलचिलाती धूप में लंबा सफर कुछ तो लिखा।

1 टिप्पणी:

  1. चेतन जी,
    आपको पिछले कई दिनो से अपनी के ज़रिए पढ़ रहा हूँ ... हर रचना को एक से बढ़कर एक पाया है ...
    हर ग़ज़ल दिल को छूती है.. हर शेर दिल तक पहुँचता है ...
    साधुवाद

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