मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

ग़ज़ल

जीवन मेरा, प्यार तुम्हारा,
मुझपर है अधिकार तुम्हारा।

बस, अब तो हो जाओ राज़ी,
वो मेरा, संसार तुम्हारा।

मैं तो सच की राह चलूँगा,
झूठ भरा घर-बार तुम्हारा।

सुख दो, दुख दो, सब सर माथे,
जो कुछ है, स्वीकार तुम्हारा।

क्यों काँटों जैसा लगता है,
मुझपर हर उपकार तुम्हारा।

ठेठ निकम्मे हो, फिर कैसे-
सपना हो साकार तुम्हारा।

मां मैं कब से सोच रहा हूँ,
कैसे उतरे भार तुम्हारा।

4 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sunder bhav liye hai ye aapkee rachana....
    मां मैं कब से सोच रहा हूँ,
    कैसे उतरे भार तुम्हारा।
    ye kaam to asambhav hai.........

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  2. मतला से मकता तक एकदम ठांय गजल है पढ़ कर दिल खुश हो गया

    आपके ब्लॉग पर पहली बार आना हुआ ब्लॉग को अनुसरण कर रहा हूँ अब तो आना जाना लगा रहेगा

    गजल का मकता बहुत पसंद आया

    क्या आप तरही मुशायरे में भाग लेना चाहते है आपका स्वागत है

    इस पते पर क्लिक कर सकते हैं

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  3. सुख दो, दुख दो, सब सर माथे,
    जो कुछ है, स्वीकार तुम्हारा।

    मां मैं कब से सोच रहा हूँ,
    कैसे उतरे भार तुम्हारा।
    वाह बहुत सुन्दर । शुभकामनायें

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