शुक्रवार, 11 जून 2010

प्यार के दोहे

प्यार युद्ध, हिंसा नहीं, प्यार नहीं हथियार,
प्यार के आगे झुक गईं, कितनी ही सरकार।

प्यार कृष्ण का रूप है, जिसे भजें रसखान,
प्यार जिसे मिल जाये वो, बन जाये इंसान।

प्यार हृदय की पीर है, प्यार नयन का नीर,
ढाई आखर प्यार है, कह गए संत कबीर।

प्यार न समझे छल-कपट, चोरी, झूठ या लूट,
प्यार पवित्र रिश्ता अमर, जिसकी डोर अटूट।

प्यार में ओझल चेतना, प्यार में गायब चैन,
प्यार अश्रु अविरल-विकल, जिसमें भीगें नैन।

5 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार अल्फाज को कितने रूपो और कितने रंगों से संवारा है आपने..सच है प्रेम से ही सारा संसार है..इस अकथ कहानी का कोई अन्त नहीं..सुन्दर रचना हेतु बधाई।

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  2. sabhee panktiya ek se bad kar ek hai........
    Ati sunder

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  3. प्यार जिसे मिल जाये वो, बन जाये इंसान।...Bahut Khub....Kahan aapne...Janab...Bhagwan aur Haiwan ko Kisne dekha bhi nahi....Pyar ji Haiwan ko mile....wo ban jayega insan....

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